संत समाज के लिए विनम्र आत्ममंथन: पद-प्रतिष्ठा की दौड़ और अखाड़ा परिषद के चुनाव पर उठे सवाल,
हरिद्वार : अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के हालिया चुनाव संतों के बीच बढ़ते विवाद और गुटबाजी के कारण चर्चा में हैं। इस स्थिति ने अब आम श्रद्धालुओं के साथ-साथ संत समाज को भी आत्ममंथन के लिए मजबूर कर दिया है। संतों का जीवन त्याग, तपस्या, वैराग्य और सेवा का प्रतीक माना जाता है, जो समाज को मोह-माया और अहंकार से दूर रहने की सीख देते हैं। ऐसे में प द और प्रतिष्ठा के लिए संतों के बीच सार्वजनिक विवाद करोड़ों भक्तों की आस्था को ठेस पहुँचा रहा है।जानकारों का मानना है कि यदि किसी पक्ष को चुनाव में स्पष्ट बहुमत प्राप्त है, तो लोकतांत्रिक मर्यादा का सम्मान करते हुए उसे स्वीकार करना ही संत परंपरा की गरिमा के अनुकूल है। संत समाज केवल धर्म का ही नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के चरित्र का मार्गदर्शक है। संतों की वास्तविक पहचान पद से बड़े धर्म, प्रतिष्ठा से बड़े त्याग और विजय से बड़ी एकता में निहित है। समय की माँग है कि संत समाज आत्मचिंतन कर समाज के सामने एकता का उदाहरण प्रस्तुत करे।
